कंटकारी ( Solanum Xanthocarpum )

       कंटकारी ( Solanum Xanthocarpum  )
  

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         कंटकारी  बहुवर्षायु क्षुप होता है। इसके पत्ते लम्बे काँटो से युक्त हरे होते है ; पुष्प नीले रंग के होते है ; फल क्च्चे हरित वर्ण के और पकने पर पीले रंग के हो जाते है।

       उष्ण प्रकृति की होने के कारण कफ़वात शामक, कासहर, शोथहर, रक्तशोधक, बीज शुक्रशोधन, वातशामक, रक्तभारशामक है।
           
         कंटकारी कफ वात को कम करने में मदद करती  है। कंटकारी का पौधा कटु, और उष्ण प्रकृति का होने के कारण खाना पाचन करने में सहायता करता है। यह  फेफड़ों से हिस्टेमीन को निकालती है। 
              श्वेत कंटकारी के फल  सांस की तकलीफ, खांसी, बुखार या ज्वर, मूत्रकृच्छ्र या मूत्र संबंधी समस्या, अरुचि या खाने की कम इच्छा, भूख बढ़ाने वाली, कृमिरोधी; आदि बीमारियों के उपचार में लाभदायक होती है। श्वेत कंटकारी के फल का काढ़ा बुखार से राहत दिलाती है।

कंटकारी के प्रकार –
      कंटकारी की कई प्रजातियां होती है इसकी मुख्यतया तीन प्रजातियां –              1. छोटी कटेरी (Solanum virginiannum ), 
            2. बड़ी कटेरी (Solanum anguivi )  
            3. श्वेत कंटकारी (Solanum lasiocarpum ) 

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      छोटी कटेरी (Solanum virginiannum ) के दो भेद होते हैं  एक  बैंगनी या नीले रंग के पुष्प वाली जो  सभी जगह मिल जाती है।  दूसरी सफेद पुष्पवाली जो हर जगह नहीं मिलती है। इस दूसरी प्रजाति को सफेद कण्टकारी कहते हैं।

What is Knatkari called in English? –Solanum Xanhocarpum
सामान्य नाम – कटेरी, कंटकारी, छोटी कटई, भटकटैया, निदग्धिका, क्षुद्रा तथा व्याघ्री etc.
अंग्रेजी नाम – Yellow Berried Night shade 

Chemical Component – 
       Alkaloids,  Sterols,  Saponins,  Flavonoids and their Glycosides andalso carbohydrates,  Fatty acids,  Amino acids etc.
      
       Various Phytoactive drugs such as Salasodine, Diosgenin , β-Sitosterol and Carpesterol  are extracted from the plant.

 Properties – Anti Inflammatory, Anti oxident, Anti convulsant, Anti bacterial activity, anti asthmatic hepatoprotective cardiovascular, hypoglycemic and mosquito repellent properties.


उपयोगी भाग –   पञ्चाङ्ग- फल, पुष्प, पत्ती, बीज, तना और जड़ etc.

औषधीय उपयोग  –
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अस्थमा – 

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          – कटेरी के फलों के 15-30 ml काढ़ा +  500 mg भुनी हुई हींग + 1 gm सेंधा नमक डालकर पीने से ,

         – छोटी कटेरी के 4-5 gm कल्क + 500 mg हींग + 2 gm मधु मिलाकर, सेवन करने से ,

        – छोटी कटेरी की जड़ + श्वेत जीरक + 2-3 gm आंवला से बने चूर्णं + मधु मिलाकर प्रयोग करने से अस्थमा में लाभ होता है। 

खाँसी – 

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       – 1 gm कटेरी के फूल के चूर्ण + शहद के साथ मिलाकर चाटना , 

       – 10-20 ml पत्ते का रस / 15-30 ml जड़ का काढ़ा  + 1 ग्राम छोटी पीपल चूर्ण + 250 मिग्रा सेंधानमक ,

       – छोटी कटेरी के रस से पकाए हुए घी को 5-10 ग्राम की मात्रा ,

       – 30 से 50 मिली कटेरी का काढ़ा + 1-2 ग्राम पिप्पली चूर्ण ,

       – सफेद कंटकारी के 1-2 ग्राम फल चूर्ण + मक्खन ,


       – 15-30 मिली कण्टकारी का काढ़े का एक सप्ताह  सेवन करने से श्वास संबंधी समस्या, खांसी तथा छाती के दर्द में लाभ होता है।

एलर्जी / जुकाम / प्रतिश्याय –

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       –  गिलोय और छोटी कटेरी  सबको समान मात्रा में (50 ग्राम) लेकर 1 लीटर पानी में पकाकर एक चौथाई भाग का काढ़ा दिन में दो बार  पिलाने से बहुत लाभ मिलता है।

बुखार – 

        – कटेरी की जड़ + गिलोय को समान मात्रा में मिलाकर काढ़ा बनाकर  10-20 मिली काढ़ा को सुबह शाम पिलाने से बुखार तथा पूरे शरीर का दर्द कम होता है।

सिरदर्द –  
       – कटेरी के फल के रस को माथे पर लेप करने से सिर दर्दमें काफी आराम मिलता  है।

दांत दर्द – 

       – श्वेत कंटकारी के बीजों का धूम्रपान के रूप में प्रयोग करने से दाँतों दर्द तथा दंतकृमि में आराम मिलता है।

मूत्र संबंधी समस्याओं –

        – छोटी कटेरी के जड़ के चूर्ण + बड़ी कटेरी के जड़ का चूर्ण,  समान भाग मिलाकर, 2 चम्मच दही के साथ, पथरी, मूत्र त्याग में कठिनता तथा जलोदर  में लाभ ।


         – कटेरी की जड़, सोंठ, बला-मूल, गोखरू तथा गुड़ को समभाग लेकर दूध में पकाकर, 15-30 मिली सुबह-शाम पीने से मल-मूत्र की रुकावट, बुखार और सूजन दूर होती है।


NOTE – आयुर्वेद औषधियों की पहचान व आसानी से उपलब्ध नहीं होने पर आजकल सभी उत्पाद तैयार किये हुए टेबलेट, सिरप, अवलेह, ड्रॉप्स, चूर्ण   पेटेंट रूप में दवा विक्रेता के पास आसानी से उपलब्ध हो जाते है जो की चिकित्सकीय सलाह के अनुसार उपयोग लिए जा सकते है |
https://ayurvedacareindia.com/2019/12/allergic-rhinitis-8005999426.html 

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